rahat indori






इन्तेज़मात   नये  सिरे  से  सम्भाले   जायें |
जितने कमज़र्फ़ हैं महफ़िल से  निकाले जायें |

मेरा घर आग की  लपटों  में  छुपा  है लेकिन,
जब   मज़ा  है  तेरे  आँगन  में  उजाले जायें |

ग़म सलामत  है  तो  पीते  ही  रहेंगे  लेकिन,
पहले  मैख़ाने   की   हालत   सम्भाले   जायें |

ख़ाली  वक़्तों  में  कहीं  बैठ  के  रोलें   यारो,
फ़ुर्सतें  हैं  तो   समन्दर   ही   खगांले   जायें |

ख़ाक में यूँ न मिला  ज़ब्त  की  तौहीन  न  कर,
ये  वो  आँसू  हैं  जो  दुनिया  को बहा ले जायें |

हम भी प्यासे  हैं  ये  एहसास तो  हो  साक़ी  को,
ख़ाली  शीशे  ही  हवाओं  में  उछाले  जायें|

आओ  शहर  में  नये  दोस्त  बनायें  "राहत"
आस्तीनों   में   चलो  साँप  ही  पाले  जायें |

डा. राहत इन्दोरी



काली रातों को भी रंगीन कहा है मैंने

तेरी हर बात पे आमीन कहा है मैंने

तेरी दस्तार पे तन्कीद की हिम्मत तो नहीं
अपनी पापोश को कालीन कहा है मैंने

मस्लेहत कहिये इसे या के सियासत कहिये
चील-कौओं को भी शाहीन कहा है मैंने

ज़ायके बारहा आँखों में मज़ा देते हैं
बाज़ चेहरों को भी नमकीन कहा है मैंने

तूने फ़न की नहीं शिजरे की हिमायत की है
तेरे ऐजाज़ को तौहीन कहा है मैंने


डा. राहत इन्दोरी



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