પડ્યો છું માર્ગની વચ્ચે મને પથ્થર ન માની લે. બ ની ઠોકર સુધારું છું મને ઈશ્વર ન માની લે. ભર્યા છે મેલ ભીતરમાં ઘણાયે, જન્મની સાથે ઠઠારો બહારનો જોઈ મને સુંદર ન માની લે. - મન્સૂર કુરેશી
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कोई समझाए ये क्या रंग है मैख़ाने का; आँख साकी की उठे नाम हो पैमाने का; गर्मी-ए-शमा का अफ़साना सुनाने वालों; रक्स देखा नहीं तुमने अभी परवाने का; चश्म-ए-साकी मुझे हर गम पे याद आती है; रास्ता भूल न जाऊँ कहीं मैख़ाने का; अब तो हर शाम गुज़रती है उसी कूचे में; ये नतीजा हुआ ना से तेरे समझाने का; मंज़िल-ए-ग़म से गुज़रना तो है आसाँ 'इक़बाल'; इश्क है नाम ख़ुद अपने से गुज़र जाने का। ~ Allama Iqbal 🌹
rahat indori
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इन्तेज़मात नये सिरे से सम्भाले जायें | जितने कमज़र्फ़ हैं महफ़िल से निकाले जायें | मेरा घर आग की लपटों में छुपा है लेकिन , जब मज़ा है तेरे आँगन में उजाले जायें | ग़म सलामत है तो पीते ही रहेंगे लेकिन , पहले मैख़ाने की हालत सम्भाले जायें | ख़ाली वक़्तों में कहीं बैठ के रोलें यारो , फ़ुर्सतें हैं तो समन्दर ही खगांले जायें | ख़ाक में यूँ न मिला ज़ब्त की तौहीन न कर , ये वो आँसू हैं जो दुनिया को बहा ले जायें | हम भी प्यासे हैं ये एहसास तो हो साक़ी को , ख़ाली शीशे ही हवाओं में उछाले जायें | आओ...